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VOL. 1, ISSUE 4 (2016)
कर्मफलों का नियामक: ‘‘ईश्वर’’
Authors
विनय पटेल
Abstract
यह गहन विचार-विमर्श का प्रश्न है कि ‘ईश्वर कर्मफलों का नियामक ईश्वर है अथवा नहीं।’ कभी तो ऐसा होता है कि व्यक्ति कर्म तो करता है, किन्तु तदनुसार फल की प्राप्ति नहीं हो पाती है अथवा कर्मफल तत्काल न मिलकर बहुत समय के पश्चात् प्राप्त होते हैं। प्रकारान्तर से यह कह सकते है कि जब व्यक्ति चाहता है तब उसे उसके अनुकूल फलों की प्राप्ति नहीं हो पाती है, तब उसके मन में यह सामान्य अवधारणा उत्पन्न होती है कि कर्मफलों का नियन्ता व्यक्ति स्वयं नहीं हो सकता, अन्यथा जब वह चाहता तो यथेष्ट कर्मफलों की प्राप्ति कर लेता। कर्मों पर व्यक्ति का अधिकार तो हो सकता है, किन्तु कर्म-फलों पर नहीं, यद्यपि कभी-कभी परिस्थिति के अनुसार व्यक्ति कर्मों के लिये भी किंकर्तव्य- विमूढ़ हो जाता है। वह चाहकर भी किसी कर्म को संपादित करने में असमर्थ और असहाय हो जाता है। तब इस परिस्थिति में कर्मफल पर तो क्या? कर्मों पर भी व्यक्ति का अधिकार नहीं हो पाता है। अतः कोई न कोई ऐसी सत्ता अवश्यम्भावी है, जो कर्म और कर्मफलों पर नियन्त्रण और नियमन करती है। इसी अवधारणा के साथ ही कर्मफलों के नियामक सत्ता की खोज प्रारंभ होती है।
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Pages:66-69
How to cite this article:
विनय पटेल "कर्मफलों का नियामक: ‘‘ईश्वर’’ ". International Journal of Multidisciplinary Education and Research, Vol 1, Issue 4, 2016, Pages 66-69
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