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VOL. 8, ISSUE 2 (2023)
हिन्दी भाषाः उद्भव और विकास
Authors
डॉ. रवीन्द्र कुमार
Abstract
प्रकृति निर्मित इस संसार में प्रत्येक प्राणी इस बात से अवगत है कि मानव जाति के पास समाज में अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए भाषा के अतिरिक्त कोई अन्य ठोस कारण नहीं है जो उसे दिनों-दिन उलझनों से भरपूर होते जा रहे समाज में एक संतुलित जीवन जीने में मदद दे सके। कुछेक अन्य कारण हो सकते हैं। किन्तु उसे मुख्य धारा की अपेक्षा गौण दृष्टि से देखना ही वाँछनीय रहेगा। अतीत पर दृष्टिपात से इस बात पर तो सभी एक मत हैं ही कि पाषाण युग में मानव और जानवर एक ही श्रेणी में गिने जाते थे। किन्तु अपनी बुद्धि, तर्क, विज्ञान इत्यादि के इस्तेमाल और भाषा के उद्भव, विकास और इस्तेमाल ने ही उसे अन्य प्राणियों की अपेक्षा श्रेष्ठत्म स्थान पर ला खड़ा किया है। भारत देश अनेकता में एकता के कारण पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाये हुए है। भाषा के संबंध में भी उसकी यही पहचान है। प्रत्येक राज्य में अपनी-अपनी भाषा का बोलबाला है। किन्तु फिर भी ‘हिन्दी भाषा’ उसके लिए मान-सम्मान एवं गर्व का विषय रहा है। अपभ्रंश के पश्चात् वर्तमान संदर्भ में अपना मानक रूप बनाने तक उसे एक लम्बा समय व्यतीत करना पड़ा और यह प्रक्रिया आज भी निरंतर जारी है।
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Pages:81-83
How to cite this article:
डॉ. रवीन्द्र कुमार "हिन्दी भाषाः उद्भव और विकास". International Journal of Multidisciplinary Education and Research, Vol 8, Issue 2, 2023, Pages 81-83
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