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VOL. 8, ISSUE 3 (2023)
विश्व व्यापार संगठन संगठन तथा भारतः WTO एक आलोचनात्मक अध्ययन
Authors
सरिता
Abstract
व्यवहारिक रूप से सभी देश अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के मुक्त प्रवाह पर कुछ प्रतिबंध लगाते हैं।WTO इन प्रतिबंधों तथा नियमों का राष्ट्र के व्यापार से संबंध होता है, अतः इन्हे सामान्यतः व्यापार नीतियों के रूप में जाना जाता है। जब हम व्यापारिक नीतियों पर विभिन्न अधि राष्ट्र प्रभावों तथा अंतर्राष्ट्रीय समझौते के प्रभावों का चिंतन करते हैं। तब हमारे ध्यान में भूमंडलीय व्यापारिक नीति आती है। सन् 1930 के दशक के आरम्भ में महामंदी के दौरान विष्व व्यापार में भारी गिरावट आयी। इसका कारण अनेक देशों द्वारा आयातों पर निर्बाध प्रशुल्कों का लगाया जाना था। इसके परिणामस्वरूप आर्थिक गतिविधि में कमी हुई, कार्यकुशलता का स्तर गिरा तथा व्यापार में गिरावट आई। रोजगार में कोई वृद्धि नहीं हुई। तब से ऐसी स्थिति की भविष्य में पुनरावृत्ति को रोकने हेतु कई बहुपक्षीय तथा क्षेत्रीय समझौते किए गए हैं। मराकश (मोरक्को) समझौते के फलस्वरूप अप्रैल 1994 में विष्व व्यापार संगठन के जन्म का बीज़ पड़ा और 1 जनवरी 1995 से यह अस्तित्व में आ गया। लगभग 85 देशों ने इसकी सदस्यता उसी समय स्वीकर कर लिया था। भारत इन देशों में से एक था। इस प्रकार 31 दिसम्बर 1995 तक ‘गाट’ और विष्व व्यापार संगठन दोनों ही अस्तित्व में थे। 1 जनवरी 1996 से ग्रांट का अब कोई अस्तित्व नहीं है और उसकी जगह विष्व व्यापार संगठन ने ले लिया है। जव विष्व बाजार प्रतिस्पर्धा की वृद्धि द्वारा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देगा। यह एक बहुपक्षीय संधि है WTO जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के नियमों का निर्धारण करती है।
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Pages:40-41
How to cite this article:
सरिता "विश्व व्यापार संगठन संगठन तथा भारतः WTO एक आलोचनात्मक अध्ययन". International Journal of Multidisciplinary Education and Research, Vol 8, Issue 3, 2023, Pages 40-41
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