Logo
International Journal of
Multidisciplinary
Education and Research

Search

ARCHIVES
VOL. 8, ISSUE 3 (2023)
भारत में सम्प्रदायवाद का उद्भव एवं विकास का एक अध्ययन
Authors
पवन कुमार
Abstract
वर्तमान भारत में सम्प्रदायवाद अकेला सबसे बड़ा विनाशकारी विचारधारा का रूप ग्रहण कर चुका है। जिस पर व्यापक पैमाने पर विचार-विमर्श करना एक अति प्रासांगिक मसला बन चुका है। धर्म में व्यापक, विस्तृत एवं विशाल विचारधारा होती हैं। धर्म के इसी व्यापक, विस्तृत एवं विशाल विचारधारा से निःसृत सीमित एवं खण्ड़ित विचारधारा वाले समूह को सम्प्रदाय कहते हैं। सम्प्रदाय का संबंध और आधार धर्म तो होता ही है परंतु जब इसमें राजनीति प्रवेश कर जाती है तो समाज और राष्ट्र पर दुष्प्रभाव पड़े लगता है और धर्म की आड़ लेकर लोग राजनीतिक उथल-पुथल करने लगते हैं। धर्म और धार्मिक प्रचलन में निष्ठा सम्प्रदायवाद नहीं है। धर्म का शोषण सम्प्रदायवाद है। किसी धार्मिक समुदाय का अन्य धार्मिक समुदाय तथा राष्ट्र के खिलाफ प्रयोग करना सम्प्रदायवाद है। अतः सम्प्रदायवाद धार्मिकता नहीं है। धर्म तो मनुष्य को आध्यात्मिक अनुशासन प्रदान करता है लेकिन सम्प्रदायवाद इस अनुशासन को तोड़ता है। सम्प्रदायवादी धर्म के संकीर्ण परिवेश में अपने आपको सीमित करते हैं और अपने आपको साम्प्रदायिक दल तक ही महदूद रखते है।
Download
Pages:44-45
How to cite this article:
पवन कुमार "भारत में सम्प्रदायवाद का उद्भव एवं विकास का एक अध्ययन". International Journal of Multidisciplinary Education and Research, Vol 8, Issue 3, 2023, Pages 44-45
Download Author Certificate

Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.